लखनऊ में सैलाब की आँखों देखी
सैलाब ने सिर्फ घर नहीं डुबोए, हजारों आंखों के ख्वाब, बच्चों की मुस्कान और परिवारों का सुकून भी छीन लिया
- BP NEWS BHARAT,
लख़नऊ, कुछ सैलाब सिर्फ घरों में नहीं उतरते, वे इंसान की आंखों, उसकी यादों और उसके दिल में भी हमेशा के लिए बस जाते हैं। पानी उतर जाता है, गलियां फिर दिखाई देने लगती हैं, लेकिन उस पानी के साथ बह जाने वाला सुकून, वह बेफिक्री और अपने घर में महफूज होने का एहसास शायद बरसों तक वापस नहीं लौटता।
फैजुल्लागंज की बाढ़ सिर्फ पानी से घिरी बस्तियों की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की दास्तान है, जिनकी आंखों के सामने उनकी मेहनत, उनकी जमा-पूंजी और उनकी जिंदगी का सबसे प्यारा ठिकाना पानी में डूबता चला गया। यह उन मांओं की कहानी है, जो अपने बच्चों को सीने से लगाकर उन्हें तसल्ली देती रहीं, जबकि उनके अपने दिल में डर और बेबसी का तूफान उठ रहा था। यह उन बापों की कहानी है, जो परिवार को महफूज़ जगह पहुंचाने की कोशिश करते रहे, मगर अपने घर को बचाने के लिए उनके पास कोई रास्ता नहीं था।
और यह उन बच्चों की भी कहानी है, जिन्होंने शायद पहली बार महसूस किया कि कभी-कभी अपना घर भी इंसान को महफूज नहीं रख पाता।
जब सुबह हुई, तो रास्ते पानी में गुम हो चुके थे
उस दिन फैजुल्लागंज की सुबह कुछ अलग थी।
सूरज आसमान पर था, लेकिन उसकी रोशनी जैसे पानी में कहीं खो गई थी। गलियां थीं, मगर रास्ते नहीं थे। घर थे, लेकिन चौखटों तक पहुंचने का रास्ता नहीं था। चारों तरफ पानी था और उस पानी के बीच जिंदगी किसी तरह खुद को बचाए रखने की कोशिश कर रही थी।
पहले नाले उफनाए। फिर पानी धीरे-धीरे गलियों में दाखिल हुआ। देखते ही देखते वह दरवाजों तक पहुंच गया और फिर घरों के अंदर घुसने लगा।
किसी ने ईंट लगा कर तख्त और बेड ऊंचे कर दिए। किसी ने सामान छत पर पहुंचा दिया। किसी ने जरूरी कागजात समेटे, तो किसी ने बच्चों को सुरक्षित जगह ले जाने की तैयारी शुरू कर दी।
हर कोई अपने हिस्से की जिंदगी बचाने में लगा था।
लेकिन पानी को किसी की मजबूरी का एहसास नहीं था।
वह बढ़ता रहा। घरों में दाखिल होता रहा और लोगों को उनकी ही चौखट से बेदखल करता रहा।
फैजुल्लागंज की गलियों में उस वक्त सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की थी, जिन्हें अपना घर छोड़कर नकल ए मकानी (पलायन) पर मजबूर होना पड़ा।
कंधे पर सामान की छोटी-सी गठरी, गोद में बच्चा, हाथ में जरूरी सामान और आंखों में हजार सवाल।
पीछे मुड़कर देखते तो अपना घर दिखाई देता।
वही घर, जिसमें कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी। वही दीवारें, जिनके बीच त्योहार मनाए गए थे। वही आंगन, जहां परिवार के लोग साथ बैठकर खाना खाते थे। वही छत, जिसके नीचे किसी ने अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के सपने देखे थे।
आज उसी घर में पानी भरा था।
एक आदमी घर से निकलते वक्त बार-बार पीछे मुड़कर देखता है। शायद उसके मन में एक ही सवाल उठता है:
“पता नहीं, लौटकर आऊंगा तो मेरा घर मुझे उसी हालत में मिलेगा भी या नहीं?”
उस सवाल का जवाब उसके पास नहीं। प्रशासन के पास क्या जवाब है, यह भी उसे मालूम नहीं।
वह बस अपना घर छोड़कर आगे बढ़ जाता है।
लेकिन सच तो यह है कि उसका शरीर घर से बाहर निकलता है, उसका दिल वहीं रह जाता है।
*अपना घर छोड़कर दूसरों के यहां रहना भी एक दर्द है*
बाढ़ की सबसे तकलीफदेह तस्वीरों में एक तस्वीर वह भी है, जो कैमरों में शायद ही कभी दिखाई देती है।
वह तस्वीर है अपना घर छोड़कर किसी रिश्तेदार, दोस्त या अहबाब के यहां मजबूरी में पनाह लेने वाले परिवार की।
जिस इंसान ने जिंदगी भर अपनी छत के नीचे रहने का सपना देखा हो, जिसके लिए घर सिर्फ ईंट, गारे और सीमेंट की इमारत नहीं, बल्कि उसकी इज्जत, पहचान और सुकून का नाम हो, उसके लिए अपना घर छोड़कर दूसरे के यहां ठहरना कितना मुश्किल होता होगा, इसे वही समझ सकता है जिसने ऐसी मजबूरी का सामना किया हो।
रिश्तेदार दरवाजा खोलता है। दोस्त अपने घर में जगह देता है। कोई कहता है, “भाई, जब तक चाहो यहीं रहो।” कोई अपने बच्चों के साथ बाढ़ पीड़ित परिवार के बच्चों को भी जगह देता है। कोई बिस्तर देता है, कोई खाना खिलाता है, तो कोई जरूरत का सामान जुटाता है।
यह इंसानियत का खूबसूरत चेहरा है।
लेकिन मेजबान के चेहरे पर मुस्कान देखकर भी मजबूर होकर आए परिवार के दिल का दर्द खत्म नहीं होता।
वह अपने मेजबान की मेहरबानी का शुक्रगुजार होता है, मगर भीतर ही भीतर अपने घर को याद करता रहता है।
रात को जब सब सो जाते हैं, तो उसे अपना घर याद आता है। अपनी चारपाई , तख्त अपना बेड याद आता है। अपना कमरा, अपनी रसोई, अपना आंगन और वह जगह याद आती है, जहां वह बिना किसी झिझक के बैठ सकता था।
यहां उसे जगह मिली है, मोहब्बत मिली है, सहारा मिला है, लेकिन अपना घर तो अपना ही होता है।
कई बार वह अपनी परेशानी बताने से भी हिचकता है। उसे डर लगता है कि कहीं उसकी वजह से मेजबान परिवार को परेशानी तो नहीं हो रही। कहीं उसके बच्चों के कारण दूसरे बच्चों को तकलीफ तो नहीं हो रही। कहीं वह जरूरत से ज्यादा दिन तो नहीं रुक गया।
वह बार-बार कहता है, “बस, पानी उतर जाए तो हम अपने घर चले जाएंगे।”
लेकिन यह कहते हुए शायद उसे खुद भी नहीं मालूम होता कि पानी कब उतरेगा, घर कब रहने लायक होगा और जिंदगी कब फिर पटरी पर लौटेगी।
उसके बच्चे दूसरे घर में खेलते हैं, लेकिन अपने घर की तलाश उनकी आंखों में बनी रहती है।
उनकी मां दूसरों की रसोई में खाना बनाते हुए अपने उस चूल्हे को याद करती है, जहां कभी उसके परिवार का खाना पकता था।
घर का मुखिया दिन में लोगों के सामने हिम्मत दिखाता है, मगर रात को उसे अपनी जिम्मेदारियां याद आती हैं। घर की मरम्मत कैसे होगी? भीगा हुआ सामान कहां रखा जाएगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? रोजी-रोटी का क्या होगा?
और सबसे बड़ा सवाल, अगर अगली बारिश में फिर यही सब हुआ तो क्या करेंगे?
जरा सोचिए, किसी इंसान के लिए इससे बड़ी बेबसी क्या होगी कि वह अपने ही घर में लौटने के लिए पानी उतरने का इंतजार करे और उसे यह भी न पता हो कि उसका इंतजार कितने दिनों का है।
किसी को पनाह देना इंसानियत है, लेकिन किसी को अपना घर छोड़ने पर मजबूर न होना पड़े, ऐसा इंतजाम करना शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी है।
फैजुल्लागंज के बाढ़ पीड़ितों को रिश्तेदारों और दोस्तों का सहारा जरूर मिला है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अपनी मजबूरी का बोझ अपनों के कंधों पर रखते रहेंगे?
*बच्चों के सवाल और मां की खामोशी*
बच्चों के लिए सैलाब अब सिर्फ बारिश का पानी नहीं रहा। वह डर बन गया है।
किसी की किताबें भीग गईं। किसी का स्कूल का बैग पानी में खराब हो गया। किसी के खिलौने बिखर गए। किसी का स्कूल जाना बंद हो गया।
लेकिन बच्चों का सबसे बड़ा नुकसान उनके सामान का नहीं, उनके मन के सुकून का है।
वे पानी देखते हैं तो सहम जाते हैं।
वे अपनी मां से पूछते हैं:
“अम्मी, हम अपने घर कब जाएंगे?”
मां उन्हें सीने से लगा लेती है।
“जल्दी जाएंगे बेटा।”
वह यह कह तो देती है, मगर उसके पास भी कोई पक्की तारीख नहीं होती।
बच्चा फिर पूछता है:
“अम्मी, हमारे घर का पानी कब निकलेगा?”
मां खामोश हो जाती है।
उसकी आंखें बहुत कुछ कहना चाहती हैं, मगर वह अपने बच्चे के सामने रोना नहीं चाहती।
वह उसके सिर पर हाथ फेरती है, उसे बहलाती है और अपने दिल के डर को छिपाने की कोशिश करती है।
उस मां को कौन समझाए कि बच्चे को तसल्ली देने के लिए उसके पास शब्द तो हैं, लेकिन हालात बदलने की ताकत उसके पास नहीं।
और उस बच्चे को कौन बताए कि उसके घर में पानी क्यों आया? हर बारिश के साथ उसके परिवार को अपना घर छोड़ने का डर क्यों सताता है? आखिर उसे अपने ही घर में सुरक्षित रहने का भरोसा क्यों नहीं मिल पा रहा?
ये सवाल सिर्फ एक बच्चे के नहीं हैं। ये फैजुल्लागंज के उन तमाम बच्चों के सवाल हैं, जिनका बचपन हर साल बाढ़ की आशंका के साये में गुजरता है।
*नदी के किनारे मकान बने, लेकिन सवाल सिर्फ लोगों से ही क्यों?*
बाढ़ के समय अक्सर यह सवाल उठता है कि नदी के किनारे मकान क्यों बनाए गए।
यह सवाल अपनी जगह बहुत अहम है। नदी के कुदरती बहाव क्षेत्र में तामीर, जल निकासी में रुकावट और अतिक्रमण जैसे मामलों की जांच होनी चाहिए। जहां नियमों का उल्लंघन हुआ है, वहां कानून के मुताबिक कार्रवाई भी होनी चाहिए।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी उतना ही जरूरी है।
जब बस्तियां बस रही थीं, जब तमिराती काम हो रहे थे और जब बाढ़ का खतरा मौजूद था, तब संबंधित विभागों और जिम्मेदार एदारों ने क्या किया?
क्या लोगों को समय रहते खतरे के बारे में बताया गया? क्या तामीरात से मुताअलिक क़वानीन को नाफ़िज़ किया गया? क्या नालों और जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त रखी गई? क्या बाढ़ के खतरे का आकलन करके स्थायी समाधान तैयार किया गया?
अगर कहीं अवैध निर्माण हुआ है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन केवल गरीब परिवारों को क़ुसूरवार ठहराकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
गलत निर्माण की जांच भी होनी चाहिए और सरकारी योजनाओं में हुई देरी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
क्योंकि पानी में डूबने वाला घर किसी का भी हो, उसके भीतर रहने वाले इंसान की सुरक्षा का सवाल सबसे पहले आता है।
*फैजुल्लागंज अब सिर्फ राहत नहीं, जवाब भी मांग रहा है*
फैजुल्लागंज की आवाम ने मुश्किल वक्त देखा है। लोगों ने अपना घर छोड़ा है। दूसरों के यहां पनाह ली है। बच्चों को संभाला है। अपने सामान को बचाने की कोशिश की है और हर गुजरते दिन के साथ पानी उतरने का इंतजार किया है।
लेकिन अब उनके सवालों को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
लोग यह नहीं चाहते कि हर बार बाढ़ आने पर कुछ दिन राहत सामग्री बांटी जाए, कुछ तस्वीरें खिंचें और फिर मामला ठंडा पड़ जाए।
लोग चाहते हैं कि उनकी परेशानी का मुस्तक़िल हल निकले।
वे चाहते हैं कि अगली बारिश में उनके बच्चों को फिर यह न पूछना पड़े कि अम्मी, पानी घर में तो नहीं आएगा?
वे चाहते हैं कि घर छोड़कर रिश्तेदारों और दोस्तों के यहां मजबूरी में रहने की नौबत न आए।
वे चाहते हैं कि उनके बुजुर्गों को पानी के बीच असहाय न बैठना पड़े।
वे चाहते हैं कि उनकी मेहनत की कमाई से बना घर हर साल पानी के खतरे में न घिरे।
और सबसे बढ़कर, वे चाहते हैं कि उनकी आवाज सुनी जाए।
फैजुल्लागंज की जनता अब अपने सवालों के जवाब चाहती है। वह जानना चाहती है कि बांध की योजना का क्या हुआ, जल निकासी की व्यवस्था कब दुरुस्त होगी और बाढ़ से बचाव के लिए जिम्मेदार विभाग आगे क्या ठोस कदम उठाएंगे।
यह आवाज किसी के खिलाफ नफरत की आवाज नहीं है। यह अपने घर, अपने बच्चों और अपने मुस्तकबिल को महफूज़ और सुरक्षित देखने की मांग है।



